मंगलवार, 5 जुलाई 2011

शांति दूत: तेनजिन ग्यात्सो (6 जुलाई जिनका जन्म दिन है)



शांति दूत: तेनजिन ग्यात्सो (6 जुलाई जिनका जन्म दिन है)
5 वर्ष की आयु में तिब्बत के धर्मगुरू बनाये गए, 15 वर्ष की अवस्था में राष्ट्राध्यक्ष बनाने के साथ ही इन्हें सभी राजनीतिक अधिकार प्रदान किये गये...........................तिब्बत व चीन के बीच शांति समझौता हेतु 20 वर्ष की आयु में एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में माओ से मुलाकात की।
जहां तक मुझे लगता है तेनजिन ग्यात्सो नाम बहुत कम लोग ही जानते हैं, चूंकि तेनजिन ग्यात्सो अब पुरे विश्वभर में परम पूज्य दलाई लामा के नाम से जाने जाते हैं। तेनजिन ग्यात्सो तिब्बतियों के 14वें धर्मगुरू व राष्ट्राध्यक्ष हैं। वास्तव में दलाईलामा एक पदवी है, जिसे यूं ही प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि यह उनके पूर्ववर्ती लामाओं द्वारा चमत्कारित तरिके से व कई अदभुत खोजों के बाद किसी को दिया जाता है। जहां तक मेरी जानकारी है और जैसा मैंने 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो के द्वारा लिखी गई बुक Freedom in Exile : The Autobiography of the Dalai Lama में पढ़ा है, उसमें उन्होंने विभिन्न अध्यायों में अनेक जानकारी दी है और उनके दलाई लामा बनने के विषय में बताया है। परम पूज्य दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो ने अपने बुक में लिखा है कि उनका जन्म 6 जुलाई 1935 में तिब्बत में हुआ और 1937 में तिब्बत के कई लामाओं व अन्य धर्मगुरूओं को यह दिव्य अनुभूति हुई कि 13वें दलाई लामा का अवतार हो चुका है और वे तिब्बत में जन्म ले चुके हैं। उन्होंने बुक में लिखा है कि जब वे मात्र दो वर्ष के थे तब लहासा से आये हुए धर्म गुरूओं ने अनेक प्रकार से उनकी परिक्षा ली और यह जाननी चाही की वास्तव में यहीं हमारे धर्म गुरू दलाइ्र लामा के अवतार हैं या फिर कोई और उन्होंने अपने बुक में आगे लिखा है कि विभिन्न परीक्षा के बाद जब सभी आश्वस्त हो गये कि मेरा ही 14वें दलाई लामा के रूप में अवतार हुआ है। तब मात्र 5 वर्ष की आयु में ही मुझे तिब्बत के धर्मगुरू की पदवी पर बैठा दिया गया और तब से मुझे कई तरह के धार्मिक संस्कार दिये जाने लगे और फिर मात्र 15 वर्ष की अल्प आयु में ही उन्हें तिब्बत का राष्ट्राध्यक्ष बना कर सारे अधिकार दे दिये गये थे, उन्होंने अपने बुक में लिखा है कि मात्र 15 वर्ष की अल्पआयु में 17नवम्बर 1950 को मैं साठ लाख जनता का राष्ट्राध्यक्ष बन गया और फिर चीन के आक्रमण के बाद जनता मुझ पर भरोसा किये हुए थी कि मैं चीन के द्वारा किये गये हमलों से व उसकी गुलामी से उन्हें मुक्ति दूंगा। बुक में आगे उन्होंने लिखा है कि चूंकि हमारा तिब्बत धार्मिक मान्यताओं व परम्पराओं को देश है और हमारे यहां लड़ाई-झगड़ा व मार-काट जैसे बातों अर्थात् कहां जाये तो विध्वंस पर विश्वास नहीं करते। इसके बावजूद हमारी अपनी सेना थी, जिसमें करीब 10 हजार के लगभग सैनिक थे, लेकिन उनके पास ना तो चीन से मुकाबला करने लायक आधुनिक हथियार थे और ना ही हमारी सेना उनके मुकाबले संख्या में थी। उन्होंने इस विषय में लिखा है कि इसके बाद से लगातार चीन की गुलामी से मुक्ति के लिये मेरे द्वारा अपनी जनता के विश्वास को सही साबित करने के लिये शांति समझौते के प्रर्यत्न किये जा रहे हैं, इसी विषय पर उन्होंने चीन यात्रा का भी जिक्र किया है और उसमें लिखा है कि वे चीन यात्रा पर शांति समझौता व तिब्बत से सैनिकों की वापसी की बात को लेकर 1955 मंे बिंजिंग मंे माओ से मुलाकात की लेकिन इसका भी कोई खास असर नहीं हुआ। उन्होंने आगे लिखा है कि चीन के द्वारा जो सत्रह सूत्रिय समझौता पत्र हमें दिया गया था, उसमें मात्र तिब्बत की सेना को चीन की सेना में नहीं मिलाने वाली बात पर ही माओ ने विचार करते हुए इसे अभी छोड़.............................दिया था..............................इसके बाद से लगातार चीनी आक्रमण व तिब्बत में चीनी हस्तक्षेप से मुक्ति व गुलामी से आजादी के लिये लगातार शांति दूत तेनजिन ग्यात्सो अर्थात् परम पूज्य दलाई लामा शांति दूत के रूप में संघर्षरत हैं।

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